केंद्र सरकार देश के हालत बद से बदतर करने पर तुली हुई है। आर्थिक मोर्चे पर सरकार फेल हो चुकी है । पांच साल के दूसरे कार्यकाल में सप्रंग हर मोर्चे पर विफल साबित हुई है। सरकार ने ओछी राजनीति की सारी हदें लाघ दी है। पूर्व सेना प्रमुख वीके सिंह के रेवाडी रैली में नरेंद्र मोदी की साथ मंच साझा करने से खार खाई बैठी केंद्र सरकार को छह महीने पहले मिली रिपोर्ट को एक अंग्रेजी दैनिक ने उजागर कर दिया । गंभीर प्रश्न ये ही कि सरकार छह महीने तक रिपोर्ट को दबाए क्यों बैठे रही। अगर मामला इतना ही गंभीर था तो फिर तत्काल कार्रवाही क्यों नहीं की गई।
यूपीए दो के कार्यकाल में जितना नकारात्मक असर सेना के मनोबल पर पड़ा है उतना तो शायद चीन से युद्ध हारने के बाद भी नहीं पड़ा होगा। यूपीए दो का कार्यकाल सेना के राजनीतिकरण के लिए भी जाना जाएगा। जिस संस्था पर अराजनैतिक होने पर पूरे देश को नाज था वहीं आज विश्लेषक मान रहे है कि सेना का भी राजनीतिकरण किया जा रहा है । भारतीय सेना की लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्रति वचनवद्धता सराहनीय है लेकिन इन सब मामलों से उस प्रतिवद्धता को भी नुकसान पहुंच रहा है। पूर्व सैन्य अधिकारी सरकार के इस रुख के खिलाफ हैं और सीधे सीधे नरेंद्र मोदी के साथ वीके सिंह मंच साझा करने से इस मामले को जोड़ रहे है। हर रिपोर्ट का सबसे हास्यास्पद पहलू ये है कि जनरल वीके सिंह ने जम्मू कश्मीर की निर्वाचित उमर अब्दुल्ला सरकार को गिराने का प्रयास किया , वो भी जम्मू कश्मीर सरकार में कृषिमंत्रि गुलाम हसन मीर को एक करोड़ रुपए देकर ?
विडंबना तो देखिए केंद्र सरकार पांच करोड़ देकर एक सांसद खरीद पाती है और सेना का सर्वोच्च अधिकारी एक करोड़ में सरकार गिराना चाहता है। इससे हास्यास्पद क्या हो सकता है कि सरकार बनाने के लिए निर्दलीय विधायक एक करोड़ लेते हैं और सेना प्रमुख एक करोड़ में निर्वाचित सरकार गिराना चाहते है। लगता है निर्वाचित सरकार बड़े सस्ते में गिरने लगी हैं। वैसे पहले तो वीके सिंह पर केंद्र सरकार के तख्तापलट के आरोप भी लग चुके हैं। जनरल वीके सिंह पहले सेनाध्यक्ष थे जिन्होंने सेना में चल रहे भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की कोशिश की थी। सेना में हथियारों की कमी की बात की थी। लेकिन उनके ये कदम किसी को रास नहीं आए जिसका खामियाजा उनको भुगतना पड़ रहा है। जनरल वीके सिंह के जितने आलोचक हैं उससे ज्यादा उनके समर्थक है वो पूर्व सैनिकों और वर्तमान सैनिकों में खासे लोकप्रिय भी है। देश में पूर्व सैनिकों और वर्तमान सैनिकों का वोट और उनके परिवार का वोट खासी तादाद में जिसका डर यूपीए को सता रहा है कि कहीं वीके सिंह के नरेंद्र मोदी के मंच साझा करने के वोटबैंक बीजेपी की तरफ ना खिसक जाए। यूपीए सरकार अल्पकालिक लाभ के लिए देश को दीर्घकालीन संकट में धकेल रही है। जिसके परिणाम दूरगामी होंगें। उनकी कल्पना करना भी मुमकिन नहीं है।
यूपीए दो के कार्यकाल में जितना नकारात्मक असर सेना के मनोबल पर पड़ा है उतना तो शायद चीन से युद्ध हारने के बाद भी नहीं पड़ा होगा। यूपीए दो का कार्यकाल सेना के राजनीतिकरण के लिए भी जाना जाएगा। जिस संस्था पर अराजनैतिक होने पर पूरे देश को नाज था वहीं आज विश्लेषक मान रहे है कि सेना का भी राजनीतिकरण किया जा रहा है । भारतीय सेना की लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्रति वचनवद्धता सराहनीय है लेकिन इन सब मामलों से उस प्रतिवद्धता को भी नुकसान पहुंच रहा है। पूर्व सैन्य अधिकारी सरकार के इस रुख के खिलाफ हैं और सीधे सीधे नरेंद्र मोदी के साथ वीके सिंह मंच साझा करने से इस मामले को जोड़ रहे है। हर रिपोर्ट का सबसे हास्यास्पद पहलू ये है कि जनरल वीके सिंह ने जम्मू कश्मीर की निर्वाचित उमर अब्दुल्ला सरकार को गिराने का प्रयास किया , वो भी जम्मू कश्मीर सरकार में कृषिमंत्रि गुलाम हसन मीर को एक करोड़ रुपए देकर ?
विडंबना तो देखिए केंद्र सरकार पांच करोड़ देकर एक सांसद खरीद पाती है और सेना का सर्वोच्च अधिकारी एक करोड़ में सरकार गिराना चाहता है। इससे हास्यास्पद क्या हो सकता है कि सरकार बनाने के लिए निर्दलीय विधायक एक करोड़ लेते हैं और सेना प्रमुख एक करोड़ में निर्वाचित सरकार गिराना चाहते है। लगता है निर्वाचित सरकार बड़े सस्ते में गिरने लगी हैं। वैसे पहले तो वीके सिंह पर केंद्र सरकार के तख्तापलट के आरोप भी लग चुके हैं। जनरल वीके सिंह पहले सेनाध्यक्ष थे जिन्होंने सेना में चल रहे भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की कोशिश की थी। सेना में हथियारों की कमी की बात की थी। लेकिन उनके ये कदम किसी को रास नहीं आए जिसका खामियाजा उनको भुगतना पड़ रहा है। जनरल वीके सिंह के जितने आलोचक हैं उससे ज्यादा उनके समर्थक है वो पूर्व सैनिकों और वर्तमान सैनिकों में खासे लोकप्रिय भी है। देश में पूर्व सैनिकों और वर्तमान सैनिकों का वोट और उनके परिवार का वोट खासी तादाद में जिसका डर यूपीए को सता रहा है कि कहीं वीके सिंह के नरेंद्र मोदी के मंच साझा करने के वोटबैंक बीजेपी की तरफ ना खिसक जाए। यूपीए सरकार अल्पकालिक लाभ के लिए देश को दीर्घकालीन संकट में धकेल रही है। जिसके परिणाम दूरगामी होंगें। उनकी कल्पना करना भी मुमकिन नहीं है।
congress is desh ka bantadhar karne par tuli hui hai. aane vale chunavo main congress kisi bhi tarah matdatao ka dhyan ghotalon se hatana chahati hai iske liye nai tarah ke paitarebazi kar rahi hai
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