सजायाफ्ता सांसद और विधायकों को बचाने वाले
अध्यादेश पर राहुल गांधी की कड़ी प्रतिक्रिया एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा नजर आ
रही है। राहुल गांधी के विरोध करने की टाइमिंग पर सवाल उठने लाज़िमी हैं। दागी
नेताओं के प्रतिनिधित्व को बचाने के लिए लाए गए अध्यादेश पर कांग्रेस उपाध्यक्ष ने
जिस नाटकीय अंदाज़ में विरोध किया । उनके अचानक विरोध करने के तरीके से लगता है कि
पूरे नाटक की स्क्रिप्ट पहले ही तैयार कर ली गई थी। पच्चीस मिनट के भीतर राहुल
गांधी प्रेस क्लब आए और अध्यादेश को फाड़ने लायक बताया और निकल गए। राहुल गांधी का
आना और केंद्र सरकार बखिया उधेड़ कर जाना कई सवाल खड़े कर रहा है।
ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस के रणनीतिकारों ने
बाकायदा एक रणनीति तय की है जिससे ये सारा नाटक रचा गया है। मीडिया सर्वे रिपोर्ट
में राहुल गांधी नरेंद्र मोदी से कई मील पीछे बताये जा रहे हैं। ये बातें कांग्रेस
के रणनीतिकारों को भी पता हैं। जाहिर है कांग्रेस के रणनीतिकार कैसे भी इस दूरी को
पटाने की कोशिश कर होंगे। प्रधानमंत्री पहले ही राहुल के नेतृत्व में काम करने की
इच्छा जाहिर कर चुके हैं इससे साफ है कि भ्रष्टाचार के मुद्दों को गौण करने के लिए
पार्टी को कुछ तो बड़ा नाटक करना होगा। इस सोची समझी रणनीति के तहत राहुल गांधी ने
केंद्र सरकार की बखिया उधेड़ी ताकि राहुल गांधी की छवि भ्रष्टाचार सहन न करने वाले
राजनेता की बन जाए और पार्टी आने वाले चुनावों में राहुल गांधी की ईमानदारी पर वोट
मांग सके।
ऐसा नहीं है राहुल गांधी को इस अध्यादेश के बारे
में पहले से नहीं पता होगा । इस अध्यादेश पर पहले रजामंदी कोरग्रुप की बैठक में
हुई थी उसके बाद केबिनेट की बैठक में , कोरग्रुप की अध्यक्षता सोनिया गांधी करती
हैं।
पूरे मामले में दूसरा पहलू ये ही कि कांग्रेस को
सकेंत मिलने लगे थे कि राष्ट्रपति इस अध्यादेश को वापस कर देंगे, जिसके बाद सरकार
जो फजीहत होगी वो पहले से ही चार चांद लगी छवि में और अतरिक्त चार चांद लगा देती।
ये आठ चांद मिलकर आनेवाले लोकसभा चुनावों में कैसा गुल खिलाते इसका भी कांग्रेस को
आभास हो गया होगा। सारी फजीहत से बचने के लिए राहुल गांधी को सामने लाया गया और ये
संदेश देने की कोशिश की गई की वो देश की राजनीति में सफाई चाहते हैं।
राहुल गांधी ने पहली बार केंद्र में अपनी सरकार
के खिलाफ जो कड़ा रुख दिखाया है उसका फायदा भी उन्हें मिला ज्यादातर अखबारों के
सम्पादकीय में उनके इस कदम की भूरि भूरि प्रशंसा की गई है । टीम राहुल ने राहुल
गांधी और नरेंद्र मोदी के बीच में जो दूरी है उसको भी पाटने की कोशिश की है।
नरेंद्र मोदी की आक्रामक छवि के सामने राहुल गांधी की आक्रामक छवि पेश की गई है।
राहुल गांधी के इस कदम को भुनाने के लिए टीम राहुल अपने काम में लग गई है ।
महंगाई, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को छोटे साबित हो जाए कुछ ऐसा ड्रामा टीम राहुल
रचना चाहती है। चाहे उसके लिए सरकार की जो भी थोड़ी बहुत छवि बची है उसकी भी बलि
क्यों न देनी पड़े। वैसे भी कांग्रेसीजन जानते है कि यूपीए टू के कार्यकाल में ऐसा
कुछ नहीं है जिसपर गर्व से मतदाताओं को बताया जा सके और वोटों को अपने पाले में
खींचा जा सके । बचती है तो राहुल गांधी की छवि जिसको लार्जर दैन पार्टी बनाने की
फिराक में कांग्रेस के रणनीतिकार है ताकि राहुल गांधी की ईमानदारी की दुहाई देकर
वोटरों को लुभाया जा सके।
राहुल गांधी के बयान से मनमोहन सरकार की बची-खुची
छवि भी मटियामेट हो गई है और साफ हो गया
है कि केंद्र सरकार कठपुतली है जिसकों
गांधी परिवार नचाता है। केंद्र सरकार की हरेक मोर्चे पर असफलता को जनता जानती है,
इस बार कांग्रेस किसी भी रणनीति से चुनाव लड़े उसको हारना ही होगा।