देश में आजादी की बाद से ही लगातार दंगे हो रहे हैं। अभी तक
साम्प्रदायिक दंगों पर कोई भी लगाम सरकार नहीं लगा सकी है। आजादी के बाद देश को दो
बहुसंख्यक समुदायों हिंदु और मुसलमानों में वैमनस्यता कम होने की बजाय बढ़ती जा
रही है। सवाल ये उठता है कि दोनों समुदाय देश हित में आपस में मिलकर क्यों नहीं
रहते हैं। इसके कारण हमें तलाशने होंगे। आखिर देश पर अधिकांश समय तक शासन करने
वाली और खुद सेकुलर होने का झंडा बुलंद करने वाली कांग्रेस आज तक हिंदु और
मुसलमानों के बीच के अविश्वास को खत्म क्यों नहीं कर पाई है। बड़ा सवाल ये भी है
कि दोनों समुदाय एक साथ मिलजुल कर रहे इसके लिए कांग्रेस किया क्या है। कांग्रेस
की जैसी अन्य स्वकथित धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक पार्टियों ने भी दोनों समुदाय के बीच
बन चुकी खाई को पाटने के लिए किया क्या है।
कांग्रेस, समाजवादी पार्टी,
बहुजन समाज पार्टी आदि ने भारतीय जनता पार्टी को भगवा पार्टी बताकर और मुसलमानों
को उसका भय दिखा कर वोटबैंक के तौर पर प्रयोग किया है। अगर कांग्रेस आजादी के बाद
से दोनों समुदायों में विश्वास बहाली को लेकर ईमानदार होती तो दोनों समुदाय आज
मिलजुल कर रह रहे होते और मुजफ्फरनगर नहीं होता। कांग्रेस की मंशा कभी भी साफ नहीं
रही है। और वैसे ही समाजवादी पार्टी ने भी टोपी पहनकर मुसलमानों को उनका सबसे बड़ा
हितैषी होने की टोपी पहना रखी है ।
धर्मनिरपेक्ष पार्टी हैं सबसे
ज्यादा वैमनस्यता हो ही फैलाने के दोषी है । इन मुंहबोली धर्मनिरपेक्ष पार्टियों
की नीतियों ने बहुसंख्यक हिंदुओं की उपेक्षा करके धर्म के नाम पर जो राजनीति की है
उसी का परिणाम दंगे हैं। दंगे एक दिन और
एक घटना का परिणाम नहीं होते हैं। इन कथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों की नीतियों ने
जो विषबमन किया है वो कम कैसे होगा राजनैतिक पार्टियों ने इस पर कभी विचार नहीं
किया है । सपा जैसी पार्टियों को तो बस अल्पसंख्यकों की ही चिंता है अल्पसंख्यकों
की बेटियों को बारहवीं पास होने पर बीस हजार की छात्रवृत्ति मिलती है और
बहुसंख्यकों की बेटियां सरकार का मुंह ताकती रहती हैं। प्रधानमंत्री देश के
प्राकृतिक संसाधनों पर मुसलमानों का पहला हक बताते है कभी कांग्रेस शासित
आंध्रप्रदेश मुसलमानों को चार प्रतिशत आरक्षण देता है। तो कभी ममता इमाम को भत्ता
देने की बात करती है। आखिर ये सब राजनेता जनता को कौन सा संदेश देने की कोशिश कर
रहे हैं। इस प्रकार के बयानात से एक संदेश बहुसंख्यक समुदाय को जरुर जाता है कि वो
तुष्टिकरण की राजनीति का शिकार हो रहे हैं। अगर कांग्रेस से लेकर विभिन्न राजनैतिक
पार्टी सचमुच में देश से साम्प्रदायिक वैमस्य खत्म करने के लिए गंभीर हैं तो
उन्होंने धर्म के नाम पर जो तुष्टिकरण की नीति चलाई हुई है सबसे पहले उसे खत्म
करना होगा। क्या केंद्र सरकार ने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के नाम पर सेना को भी
धार्मिक आधार पर बांटने की कोशिश नहीं की ।
सवाल ये ही कि कांग्रेस ने दोनों समुदाय की दूरियों को पटाने के लिए
कभी कोई योजना बनाई है या सिर्फ वोटबैंक कैसे बढ़ाया जाए इसकी योजना बनाई है।
कांग्रेस की बांटों और राज करो की नीति पर काम कर रही है।
क्या लड़की छेड़ने से इतना बड़ा दंगा फैल सकता है ? एक हत्या से भी
इतना बड़ा दंगा नहीं फैल सकता है। दंगों को बड़ा बनाने जिम्मेदार केंद्र सरकार और
राज्य सरकार की भेदभावपूर्ण नीति। केंद्र
सरकार और यूपी सरकार की नीतियों की वजह से बहुसंख्यक हिंदु खुद को उपेक्षित महसूस
कर रहा है औऱ अंदर ही अंदर लावा उबल रहा था । कवाल की घटना ने उसके लिए फूस का काम
किया और फिर साम्प्रदायिकता की आग जल उठी।
वोटबैंक को बनाए रखने के लिए राजनैतिक दल सविंधान की मूलभावना धर्म
निरपेक्ष राष्ट्र की अवधारणा को भी ताक पर ऱख रहे हैं। यूपी के विदेश से शिक्षा पर
युवा मुख्यमंत्री से प्रदेश की जनता ने जो आशाएं की थी डेढ़ साल के कार्यकाल में
डेढ़ दर्जन दंगों के साथ वो भी धूमिल पड़ गई हैं और मुख्यमंत्री दंगों के लिए
जिम्मेदार आजम खां के हाथों का खिलौन ज्यादा नजर आते हैं।