Monday, 7 October 2013

कथित धर्मनिरपेक्षवादियों की दंगों में बड़ा योगदान है।

देश में आजादी की बाद से ही लगातार दंगे हो रहे हैं। अभी तक साम्प्रदायिक दंगों पर कोई भी लगाम सरकार नहीं लगा सकी है। आजादी के बाद देश को दो बहुसंख्यक समुदायों हिंदु और मुसलमानों में वैमनस्यता कम होने की बजाय बढ़ती जा रही है। सवाल ये उठता है कि दोनों समुदाय देश हित में आपस में मिलकर क्यों नहीं रहते हैं। इसके कारण हमें तलाशने होंगे। आखिर देश पर अधिकांश समय तक शासन करने वाली और खुद सेकुलर होने का झंडा बुलंद करने वाली कांग्रेस आज तक हिंदु और मुसलमानों के बीच के अविश्वास को खत्म क्यों नहीं कर पाई है। बड़ा सवाल ये भी है कि दोनों समुदाय एक साथ मिलजुल कर रहे इसके लिए कांग्रेस किया क्या है। कांग्रेस की जैसी अन्य स्वकथित धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक पार्टियों ने भी दोनों समुदाय के बीच बन चुकी खाई को पाटने के लिए किया क्या है।

 कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी आदि ने भारतीय जनता पार्टी को भगवा पार्टी बताकर और मुसलमानों को उसका भय दिखा कर वोटबैंक के तौर पर प्रयोग किया है। अगर कांग्रेस आजादी के बाद से दोनों समुदायों में विश्वास बहाली को लेकर ईमानदार होती तो दोनों समुदाय आज मिलजुल कर रह रहे होते और मुजफ्फरनगर नहीं होता। कांग्रेस की मंशा कभी भी साफ नहीं रही है। और वैसे ही समाजवादी पार्टी ने भी टोपी पहनकर मुसलमानों को उनका सबसे बड़ा हितैषी होने की टोपी पहना रखी है ।
 धर्मनिरपेक्ष पार्टी हैं सबसे ज्यादा वैमनस्यता हो ही फैलाने के दोषी है । इन मुंहबोली धर्मनिरपेक्ष पार्टियों की नीतियों ने बहुसंख्यक हिंदुओं की उपेक्षा करके धर्म के नाम पर जो राजनीति की है उसी का परिणाम दंगे हैं।  दंगे एक दिन और एक घटना का परिणाम नहीं होते हैं। इन कथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों की नीतियों ने जो विषबमन किया है वो कम कैसे होगा राजनैतिक पार्टियों ने इस पर कभी विचार नहीं किया है । सपा जैसी पार्टियों को तो बस अल्पसंख्यकों की ही चिंता है अल्पसंख्यकों की बेटियों को बारहवीं पास होने पर बीस हजार की छात्रवृत्ति मिलती है और बहुसंख्यकों की बेटियां सरकार का मुंह ताकती रहती हैं। प्रधानमंत्री देश के प्राकृतिक संसाधनों पर मुसलमानों का पहला हक बताते है कभी कांग्रेस शासित आंध्रप्रदेश मुसलमानों को चार प्रतिशत आरक्षण देता है। तो कभी ममता इमाम को भत्ता देने की बात करती है। आखिर ये सब राजनेता जनता को कौन सा संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रकार के बयानात से एक संदेश बहुसंख्यक समुदाय को जरुर जाता है कि वो तुष्टिकरण की राजनीति का शिकार हो रहे हैं। अगर कांग्रेस से लेकर विभिन्न राजनैतिक पार्टी सचमुच में देश से साम्प्रदायिक वैमस्य खत्म करने के लिए गंभीर हैं तो उन्होंने धर्म के नाम पर जो तुष्टिकरण की नीति चलाई हुई है सबसे पहले उसे खत्म करना होगा। क्या केंद्र सरकार ने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के नाम पर सेना को भी धार्मिक आधार पर बांटने की कोशिश नहीं की  ।
सवाल ये ही कि कांग्रेस ने दोनों समुदाय की दूरियों को पटाने के लिए कभी कोई योजना बनाई है या सिर्फ वोटबैंक कैसे बढ़ाया जाए इसकी योजना बनाई है। कांग्रेस की बांटों और राज करो की नीति पर काम कर रही है।
क्या लड़की छेड़ने से इतना बड़ा दंगा फैल सकता है ? एक हत्या से भी इतना बड़ा दंगा नहीं फैल सकता है। दंगों को बड़ा बनाने जिम्मेदार केंद्र सरकार और राज्य सरकार की भेदभावपूर्ण नीति।  केंद्र सरकार और यूपी सरकार की नीतियों की वजह से बहुसंख्यक हिंदु खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है औऱ अंदर ही अंदर लावा उबल रहा था । कवाल की घटना ने उसके लिए फूस का काम किया और फिर साम्प्रदायिकता की आग जल उठी।

वोटबैंक को बनाए रखने के लिए राजनैतिक दल सविंधान की मूलभावना धर्म निरपेक्ष राष्ट्र की अवधारणा को भी ताक पर ऱख रहे हैं। यूपी के विदेश से शिक्षा पर युवा मुख्यमंत्री से प्रदेश की जनता ने जो आशाएं की थी डेढ़ साल के कार्यकाल में डेढ़ दर्जन दंगों के साथ वो भी धूमिल पड़ गई हैं और मुख्यमंत्री दंगों के लिए जिम्मेदार आजम खां के हाथों का खिलौन ज्यादा नजर आते हैं। 

Sunday, 29 September 2013

अध्यादेश को फाड़ने लायक बताना राहुल गांधी की एक सोची समझी राजनीतिक रणनीति

सजायाफ्ता सांसद और विधायकों को बचाने वाले अध्यादेश पर राहुल गांधी की कड़ी प्रतिक्रिया एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा नजर आ रही है। राहुल गांधी के विरोध करने की टाइमिंग पर सवाल उठने लाज़िमी हैं। दागी नेताओं के प्रतिनिधित्व को बचाने के लिए लाए गए अध्यादेश पर कांग्रेस उपाध्यक्ष ने जिस नाटकीय अंदाज़ में विरोध किया । उनके अचानक विरोध करने के तरीके से लगता है कि पूरे नाटक की स्क्रिप्ट पहले ही तैयार कर ली गई थी। पच्चीस मिनट के भीतर राहुल गांधी प्रेस क्लब आए और अध्यादेश को फाड़ने लायक बताया और निकल गए। राहुल गांधी का आना और केंद्र सरकार बखिया उधेड़ कर जाना कई सवाल खड़े कर रहा है।
ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस के रणनीतिकारों ने बाकायदा एक रणनीति तय की है जिससे ये सारा नाटक रचा गया है। मीडिया सर्वे रिपोर्ट में राहुल गांधी नरेंद्र मोदी से कई मील पीछे बताये जा रहे हैं। ये बातें कांग्रेस के रणनीतिकारों को भी पता हैं। जाहिर है कांग्रेस के रणनीतिकार कैसे भी इस दूरी को पटाने की कोशिश कर होंगे। प्रधानमंत्री पहले ही राहुल के नेतृत्व में काम करने की इच्छा जाहिर कर चुके हैं इससे साफ है कि भ्रष्टाचार के मुद्दों को गौण करने के लिए पार्टी को कुछ तो बड़ा नाटक करना होगा। इस सोची समझी रणनीति के तहत राहुल गांधी ने केंद्र सरकार की बखिया उधेड़ी ताकि राहुल गांधी की छवि भ्रष्टाचार सहन न करने वाले राजनेता की बन जाए और पार्टी आने वाले चुनावों में राहुल गांधी की ईमानदारी पर वोट मांग सके।
ऐसा नहीं है राहुल गांधी को इस अध्यादेश के बारे में पहले से नहीं पता होगा । इस अध्यादेश पर पहले रजामंदी कोरग्रुप की बैठक में हुई थी उसके बाद केबिनेट की बैठक में , कोरग्रुप की अध्यक्षता सोनिया गांधी करती हैं।
पूरे मामले में दूसरा पहलू ये ही कि कांग्रेस को सकेंत मिलने लगे थे कि राष्ट्रपति इस अध्यादेश को वापस कर देंगे, जिसके बाद सरकार जो फजीहत होगी वो पहले से ही चार चांद लगी छवि में और अतरिक्त चार चांद लगा देती। ये आठ चांद मिलकर आनेवाले लोकसभा चुनावों में कैसा गुल खिलाते इसका भी कांग्रेस को आभास हो गया होगा। सारी फजीहत से बचने के लिए राहुल गांधी को सामने लाया गया और ये संदेश देने की कोशिश की गई की वो देश की राजनीति में सफाई चाहते हैं।
राहुल गांधी ने पहली बार केंद्र में अपनी सरकार के खिलाफ जो कड़ा रुख दिखाया है उसका फायदा भी उन्हें मिला ज्यादातर अखबारों के सम्पादकीय में उनके इस कदम की भूरि भूरि प्रशंसा की गई है । टीम राहुल ने राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के बीच में जो दूरी है उसको भी पाटने की कोशिश की है। नरेंद्र मोदी की आक्रामक छवि के सामने राहुल गांधी की आक्रामक छवि पेश की गई है। राहुल गांधी के इस कदम को भुनाने के लिए टीम राहुल अपने काम में लग गई है । महंगाई, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को छोटे साबित हो जाए कुछ ऐसा ड्रामा टीम राहुल रचना चाहती है। चाहे उसके लिए सरकार की जो भी थोड़ी बहुत छवि बची है उसकी भी बलि क्यों न देनी पड़े। वैसे भी कांग्रेसीजन जानते है कि यूपीए टू के कार्यकाल में ऐसा कुछ नहीं है जिसपर गर्व से मतदाताओं को बताया जा सके और वोटों को अपने पाले में खींचा जा सके । बचती है तो राहुल गांधी की छवि जिसको लार्जर दैन पार्टी बनाने की फिराक में कांग्रेस के रणनीतिकार है ताकि राहुल गांधी की ईमानदारी की दुहाई देकर वोटरों को लुभाया जा सके।

राहुल गांधी के बयान से मनमोहन सरकार की बची-खुची छवि भी मटियामेट हो गई है  और साफ हो गया है  कि केंद्र सरकार कठपुतली है जिसकों गांधी परिवार नचाता है। केंद्र सरकार की हरेक मोर्चे पर असफलता को जनता जानती है, इस बार कांग्रेस किसी भी रणनीति से चुनाव लड़े उसको हारना ही होगा। 

Wednesday, 25 September 2013

सेना को राजनीति में घसीटना देश के लिए घातक

 
केंद्र सरकार देश के हालत बद से बदतर करने पर तुली हुई है। आर्थिक मोर्चे पर सरकार फेल हो चुकी है । पांच साल के दूसरे कार्यकाल में सप्रंग हर मोर्चे पर विफल साबित हुई है। सरकार ने ओछी राजनीति की सारी हदें लाघ दी है। पूर्व सेना प्रमुख वीके सिंह के रेवाडी रैली में नरेंद्र मोदी की साथ मंच साझा करने से खार खाई बैठी केंद्र सरकार को  छह महीने पहले मिली रिपोर्ट को एक अंग्रेजी दैनिक ने उजागर कर दिया । गंभीर प्रश्न ये ही कि सरकार छह महीने तक रिपोर्ट को दबाए क्यों बैठे रही। अगर मामला इतना ही गंभीर था तो फिर तत्काल कार्रवाही क्यों नहीं की गई।
यूपीए दो के कार्यकाल में जितना नकारात्मक असर सेना के मनोबल पर पड़ा है उतना तो शायद चीन से युद्ध हारने के बाद भी नहीं पड़ा होगा। यूपीए दो का कार्यकाल सेना के राजनीतिकरण के लिए भी जाना जाएगा। जिस संस्था पर अराजनैतिक होने पर पूरे देश को नाज था वहीं आज विश्लेषक मान रहे है कि सेना का भी राजनीतिकरण किया जा रहा है । भारतीय सेना की लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्रति वचनवद्धता सराहनीय है लेकिन इन सब मामलों से उस प्रतिवद्धता को भी नुकसान पहुंच रहा है। पूर्व सैन्य अधिकारी सरकार के इस रुख के खिलाफ हैं और सीधे सीधे नरेंद्र मोदी के साथ वीके सिंह मंच साझा करने से इस मामले को जोड़ रहे है। हर रिपोर्ट का सबसे हास्यास्पद पहलू ये है कि जनरल वीके सिंह ने जम्मू कश्मीर की निर्वाचित उमर अब्दुल्ला सरकार को गिराने का प्रयास किया , वो भी जम्मू कश्मीर सरकार में कृषिमंत्रि गुलाम हसन मीर को एक करोड़ रुपए देकर ?
 विडंबना तो देखिए केंद्र सरकार पांच करोड़ देकर एक सांसद खरीद पाती है और सेना का सर्वोच्च अधिकारी एक करोड़ में सरकार गिराना चाहता है। इससे हास्यास्पद क्या हो सकता है कि सरकार बनाने के लिए निर्दलीय विधायक एक करोड़ लेते हैं और सेना प्रमुख एक करोड़ में निर्वाचित सरकार गिराना चाहते है। लगता है निर्वाचित सरकार बड़े सस्ते में गिरने लगी हैं। वैसे पहले तो वीके सिंह पर केंद्र सरकार के तख्तापलट के आरोप भी लग चुके हैं। जनरल वीके सिंह पहले सेनाध्यक्ष थे जिन्होंने सेना में चल रहे भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की कोशिश की थी। सेना में हथियारों की कमी की बात की थी। लेकिन उनके ये कदम किसी को रास नहीं आए जिसका खामियाजा उनको भुगतना पड़ रहा है। जनरल वीके सिंह के जितने आलोचक हैं उससे ज्यादा उनके समर्थक है वो पूर्व सैनिकों और वर्तमान सैनिकों में खासे लोकप्रिय भी है। देश में पूर्व सैनिकों और वर्तमान सैनिकों का वोट और उनके परिवार का वोट खासी तादाद में जिसका डर यूपीए को सता रहा है कि कहीं वीके सिंह के नरेंद्र मोदी के मंच साझा करने के वोटबैंक बीजेपी की तरफ ना खिसक जाए। यूपीए सरकार अल्पकालिक लाभ के लिए देश को दीर्घकालीन संकट में धकेल रही है। जिसके परिणाम दूरगामी होंगें। उनकी कल्पना करना भी मुमकिन नहीं है।